भगवान विष्णु के छटे अवतार परशुराम जी थे। भगवान परशुराम भारतीय पौराणिक और धार्मिक पात्रों में से सबसे ज्यादा रहस्यमय और विवादित पात्रों में से एक है। विवादित इसलिए क्योंकि इनका नाम जुड़ा है हिन्दू धर्म के एक महत्वपूर्ण वर्ण 'क्षत्रियों' से। क्षत्रियों से चरम की शत्रुता लेने के लिए परशुराम चिरकाल से जाने जाते है। महत्वपूर्ण जानने योग्य बात ये है की इनका नाम 'राम' है, लेकिन परशु नामक शस्त्र धारण करने से 'परशुराम' कहलाए। यह परशु इन्हे साक्षात् भगवान शंकर ने दिया था। अब ये जानते है की क्यों हुआ क्षत्रियों से बैर ?
क्षत्रियों (राजाओं) से शत्रुता का कारण:
भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नी और सति रेणुका की संतान थे। 'अक्षय तृतीया' के दिन परशुराम का जन्म हुआ था। जन्म से परशुराम ब्राह्मण थे। जमदग्नी के तपस्या के कारण साक्षात् विष्णु ने ही परशुराम के रूप में उनके यहाँ अवतार लिया। परशुराम गंभीर स्वभाव के और पिता के अनन्य भक्त थे। जमदग्नी के तप के प्रभाव से परिचित होने के कारण परशुराम के मन में उनके लिए बहुत आदरयुक्त भावना थी। परशुराम अपने पिता के पास रहकर सभी शास्त्रों का अध्ययन करने लिए। साथ ही उन्होंने शस्त्र विद्या भी सीख ली थी। शास्त्र और शस्त्र दोनों का ही अभ्यास करते हुए परशुराम युवा बन गए।
उस समय पृथ्वी पर राज्य कर रहा था कार्तवीर्य अर्जुन। कार्तवीर्य अर्जुन बहुत ही बलवान था। क्षत्रियों के उचित बहुत बल, अस्त्र, शस्त्र उसने प्राप्त किये थे। अपने को सबसे अधिक बलवान और अजेय बनाने के लिए उसने घोर तपस्या करके भगवान 'दत्तात्रेय ' को प्रसन्न किया और उनसे वरदान के रूप में १ हजार हाथ मांग लिए। एक हजार हाथ मिल जाने से कार्तवीर्य अर्जुन सबसे बलशाली हो गया और 'सहस्त्रबाहु अर्जुन' के नाम से जाना जाने लगा। एक बार इसी सहस्त्रबाहु अर्जुन ने लंकापति रावण को भी बड़ी आसानी से हरा दिया था। जिसे मारने के लिए भगवान को श्रीराम रूप में आना था। रावण से भी ज्यादा शक्ति होने से सहस्त्रबाहु अर्जुन को अपने पर घमंड हो गया था।
एक दिन सहस्त्रबाहु अर्जुन परशुराम के पिता जमदग्नी के आश्रम पर आया। अतिथी और राजा का जिस प्रकार सत्कार करना चाहिए उसके अनुकूल जमदग्नी ने उनका स्वागत सत्कार किया। परन्तु कार्तवीर्य अर्जुन की नजर उनके आश्रम की 'कामधेनु ' गाय पर पड़ी। यह एक ऐसी गाय थी जो सब मनोकामना पूर्ण कर देती थी। उस गाय को देखकर कार्तवीर्य अर्जुन को मोह हुआ और जमदग्नी से बिना पूछे ही जबरन खींच कर वह गाय वो अपने साथ लेकर गया। जब परशुराम को यह बाद पता चली तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। एक क्षत्रिय राजा के इस उद्दंड और अन्यायपूर्ण बर्ताव पर उन्हें बहुत क्रोध आया।
क्षत्रियों (राजाओं) से शत्रुता का कारण:
भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नी और सति रेणुका की संतान थे। 'अक्षय तृतीया' के दिन परशुराम का जन्म हुआ था। जन्म से परशुराम ब्राह्मण थे। जमदग्नी के तपस्या के कारण साक्षात् विष्णु ने ही परशुराम के रूप में उनके यहाँ अवतार लिया। परशुराम गंभीर स्वभाव के और पिता के अनन्य भक्त थे। जमदग्नी के तप के प्रभाव से परिचित होने के कारण परशुराम के मन में उनके लिए बहुत आदरयुक्त भावना थी। परशुराम अपने पिता के पास रहकर सभी शास्त्रों का अध्ययन करने लिए। साथ ही उन्होंने शस्त्र विद्या भी सीख ली थी। शास्त्र और शस्त्र दोनों का ही अभ्यास करते हुए परशुराम युवा बन गए।
उस समय पृथ्वी पर राज्य कर रहा था कार्तवीर्य अर्जुन। कार्तवीर्य अर्जुन बहुत ही बलवान था। क्षत्रियों के उचित बहुत बल, अस्त्र, शस्त्र उसने प्राप्त किये थे। अपने को सबसे अधिक बलवान और अजेय बनाने के लिए उसने घोर तपस्या करके भगवान 'दत्तात्रेय ' को प्रसन्न किया और उनसे वरदान के रूप में १ हजार हाथ मांग लिए। एक हजार हाथ मिल जाने से कार्तवीर्य अर्जुन सबसे बलशाली हो गया और 'सहस्त्रबाहु अर्जुन' के नाम से जाना जाने लगा। एक बार इसी सहस्त्रबाहु अर्जुन ने लंकापति रावण को भी बड़ी आसानी से हरा दिया था। जिसे मारने के लिए भगवान को श्रीराम रूप में आना था। रावण से भी ज्यादा शक्ति होने से सहस्त्रबाहु अर्जुन को अपने पर घमंड हो गया था।
एक दिन सहस्त्रबाहु अर्जुन परशुराम के पिता जमदग्नी के आश्रम पर आया। अतिथी और राजा का जिस प्रकार सत्कार करना चाहिए उसके अनुकूल जमदग्नी ने उनका स्वागत सत्कार किया। परन्तु कार्तवीर्य अर्जुन की नजर उनके आश्रम की 'कामधेनु ' गाय पर पड़ी। यह एक ऐसी गाय थी जो सब मनोकामना पूर्ण कर देती थी। उस गाय को देखकर कार्तवीर्य अर्जुन को मोह हुआ और जमदग्नी से बिना पूछे ही जबरन खींच कर वह गाय वो अपने साथ लेकर गया। जब परशुराम को यह बाद पता चली तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। एक क्षत्रिय राजा के इस उद्दंड और अन्यायपूर्ण बर्ताव पर उन्हें बहुत क्रोध आया।
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