एक दिन बालक रूप में नन्हें भगवान् श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ दोपहर को बछड़े चरा रहे थे | समय दोपहर का था | सुबह ही श्रीकृष्ण ने अघासुर नामक राक्षस (जो अजगर का रूप लेकर ग्वालबालों को श्रीकृष्ण के साथ निगलने आया था) का वध कर दिया था। जब दोपहर हुई तो यमुना के तट पर सुहावनी जगह देखकर श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ भोजन के लिए बैठ गए। सभी बालकों ने बछड़ों को चरने के लिए खुला ही छोड़ दिया था।
उसी समय ब्रह्माजी ने उन बछड़ों को चुराकर छुपा दिया। सुबह की बालक श्रीकृष्ण की लीला देखकर ब्रह्माजी विस्मय में थे। उन्हें भगवान के माया की और भी लीलाएं देखने का मन हुआ। इसीलिए उन्होंने बछड़ों को छुपा लिया। जब ग्वालबालों ने देखा की बछड़े दिख नहीं रहे तब श्रीकृष्ण ने कहा की, "आप लोग भोजन करते रहिये। मैं अभी जंगल के अंदर जाकर बछड़ों को खोज लाता हूँ। " ऐसा कहकर श्रीकृष्ण बछड़ों को खोजने निकल पड़े।
इधर ब्रह्माजी ने अच्छा मौका देखकर अपनी माया से सभी ग्वालबालकों को छुपा लिया। श्रीकृष्ण सब समझ गए की ब्रह्माजी का मन रजोगुण के कारण मोहित हो गया है । आखिर में वो भी तो भगवान की माया के अधिन ही है। ब्रह्माजी की मनोदशा समझकर श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी माया झक दिखाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपने आप के ही अनेक रूप बना लिए । एक ही श्रीकृष्ण बछडों और ग्वालबालों के रुप में ढल गए। जितने जितने और जैसे जैसे बालक थे बिलकुल वैसे ही सब के सब रुप श्रीकृष्ण ने बना लिए। यहाँ तक की उनके बेत, सिंगी, बासुरी भी जिसकी जैसी थी सब वैसी ही धारण कर ली। इस तरह अपने को ही ग्वालबाल और बछडे बनाकर श्रीकृष्ण वृंदावन में लौट गये और जिस बालक का जो घर था उस उस घर में उसके बछडों के साथ प्रवेश किया। अपने अपने दिनभर के बाद आते बालकों को देखकर माता पिता आनंदित हुए।
उसी समय ब्रह्माजी ने उन बछड़ों को चुराकर छुपा दिया। सुबह की बालक श्रीकृष्ण की लीला देखकर ब्रह्माजी विस्मय में थे। उन्हें भगवान के माया की और भी लीलाएं देखने का मन हुआ। इसीलिए उन्होंने बछड़ों को छुपा लिया। जब ग्वालबालों ने देखा की बछड़े दिख नहीं रहे तब श्रीकृष्ण ने कहा की, "आप लोग भोजन करते रहिये। मैं अभी जंगल के अंदर जाकर बछड़ों को खोज लाता हूँ। " ऐसा कहकर श्रीकृष्ण बछड़ों को खोजने निकल पड़े।
इधर ब्रह्माजी ने अच्छा मौका देखकर अपनी माया से सभी ग्वालबालकों को छुपा लिया। श्रीकृष्ण सब समझ गए की ब्रह्माजी का मन रजोगुण के कारण मोहित हो गया है । आखिर में वो भी तो भगवान की माया के अधिन ही है। ब्रह्माजी की मनोदशा समझकर श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी माया झक दिखाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपने आप के ही अनेक रूप बना लिए । एक ही श्रीकृष्ण बछडों और ग्वालबालों के रुप में ढल गए। जितने जितने और जैसे जैसे बालक थे बिलकुल वैसे ही सब के सब रुप श्रीकृष्ण ने बना लिए। यहाँ तक की उनके बेत, सिंगी, बासुरी भी जिसकी जैसी थी सब वैसी ही धारण कर ली। इस तरह अपने को ही ग्वालबाल और बछडे बनाकर श्रीकृष्ण वृंदावन में लौट गये और जिस बालक का जो घर था उस उस घर में उसके बछडों के साथ प्रवेश किया। अपने अपने दिनभर के बाद आते बालकों को देखकर माता पिता आनंदित हुए।
इस प्रकार श्रीकृष्ण खुद ही सभी बच्चों के रुप बनाकर उन उन बालकों के घर उनके माता पिता के साथ रहने लगे। इस प्रकार दिन पर दिन बितते गे और एक वर्ष हो गया। किसीको भी पता नहीं था की श्रीकृष्ण ही हर एक बालक का रुप लिए विचर रहे है। गोपोंका अपने बालकों पर पहले जितना स्नेह था उससे बढता ही चला गया क्योंकि कृष्ण तो सबके अपने आत्मा ही थे जो बालक बनकर कृतार्थ कर रहे थे।
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